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Teesra Path (Chaar Dashak Ke Naty-Parishthitiyan)

by Nemichandra Jain
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170556305
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 294
  • Original Price: INR 625.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 500 grams
  • BISAC Subject(s): General

यह कृति विख्यात नाट्य-चिंतक नेमिचन्द्र जैन द्वारा लिखित नाट्य प्रस्तुतियों की समीक्षा है जिसकी अवधि 1957 से 1991 तक है। हिन्दी में ऐसी कृति की कोई परंपरा अभी तक विकसित नहीं हो पाई है जो नाट्य प्रस्तुतियों की विवेचना के माध्यम से नाट्य- प्रदर्शन को जीवंत रखे और उसके तत्कालीन परिदृश्य को समृति में ले आये। नेमिजी की पहल से ऐसी स्थिति बन रही है तो इसमें जितना लाभ रंगकर्मियों को होगा, उससे कहीं अधिक सांस्कृतिक अध्येताओं को। नेमिजी लगभग चालीस वर्षों से हिंदी के शिखर नाट्यालोचक हैं और अंग्रेजी नाट्य परंपरा के भी भारतीय टीकाकार। उनकी सम्मति नाट्य-जगत् को शक्ति देती रही है और उसके विकास में आए गतिरोध थमते रहे हैं। तीसरा पाठ यानी नाटककार, निर्देशक के दो पाठों के बाद दर्शक का पाठ। यही पाठ नाट्य प्रस्तुति की कसौटी है, उसके संप्रेषण की कसौटी है और नाटक की समग्र प्रभावान्विति की कसौटी है। नेमिजी ने पुस्तक में इसी कसौटी पर लगभग चालीस वर्ष के नाटकों को कसा है और एक तरह से आधुनिक हिंदी नाटकों की स्थिति का सिंहावलोकन किया है। यह भी ध्यातव्य है कि पुस्तक नाट्य प्रस्तुतियों की समीक्षा. उनके आस्वादन और उनके प्रभाव के प्रतिमानों को स्थिर करने की कोशिश करती है जिसकी हाल के वर्षों में जरूरत महसूस की जा रही थी। यह गौरतलब है कि हिंदी नाट्य-परिदृश्य की आधी सदी के साथ-साथ भारतीय रंगमंच की एक अनिवार्य झलक भी कृति में मिलेगी जिससे गाहेबगाहे हिंदी रंगमंच प्रभाव और संवेदना ग्रहण करता रहा है। इस तरह अंग्रेजी से लेकर संस्कृत और भारतीय भाषाओं से लेकर बोलियों तक के वे नाटक इस पुस्तक में मौजूद हैं जो अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत हुए और हिंदी नाट्य-परिदृश्य को मुकम्मल बनाने में सहायक सिद्ध हुए ।कहना अनावश्यक होगा कि अकादमिक बहसों से अलग प्रस्तुतियों पर केंद्रित यह आयोजन नये सिरे से नाट्य- परिदृश्य को जाँचने में सहायक है और नई समझ बनाने में प्रेरक भी ।

जन्म: 16 अगस्त, 1919 (आगरा)।निधन 21 मार्च, 2005 ।शिक्षा: एमए, (अंग्रेज़ी)।कवि, समालोचक, नाट्य-चिन्तक, अनुवादक, शिक्षक।1959-76 राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में वरिष्ठ प्राध्यापक, 1976-82 जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कला अनुशीलन केन्द्र के फैलो एवं प्रभारी।अंग्रेज़ी दैनिक स्टेट्समेन और टाइम्स आफ इंडिया के नाट्य-समीक्षक, दिनमान तथा नवभारत टाइम्स के स्तम्भकार, रंगमंच की विख्यात पत्रिका नटरंग के संस्थापक सम्पादक एवं नटरंग प्रतिष्ठान के संस्थापक अध्यक्ष ।कविताएँ : तार-सप्तक, (1944), एकान्त (1973), आलोचना अधूरे साक्षात्कार (उपन्यास-समीक्षा, 1966, 1989), रंगदर्शन (रंगमंचीय विवेचन, 1967, 1983, 1993), बदलते परिप्रेक्ष्य (कविता और आलोचनात्मक निवन्ध, 1968), जनांतिक (आलोचनात्मक निबन्ध, 1981), पाया पत्र तुम्हारा (मुक्तिबोध के साथ पत्र-व्यवहार, 1984), भारतीय नाट्य परम्परा (1989), दृश्य अदृश्य (संस्कृति और रंगमंच सम्बन्धी निबन्ध, 1993), इंडियन थिएटर (अंग्रेज़ी में भारत की नाट्य परम्परा का विवेचन, 1992) ।सम्पादन : मुक्तिबोध रचनावली, 6 खण्ड (1980, 1985), आधुनिक हिन्दी नाटक और रंगमंच (1979), नये हिन्दी लघु नाटक (1986), मोहन राकेश के सम्पूर्ण नाटक (1993)।अनुवाद: नाटक, उपन्यास, कविता, समालोचना, समाजशास्त्र, दर्शन, राजनीति, इतिहास सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ।नाट्य विशेषज्ञ के रूप में रूस, अमेरीका, इंग्लैण्ड, पश्चिमी एवं पूर्वी जर्मनी, फ्रांस, यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड आदि देशों की यात्रा।

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