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Uljhan

by Shakuntala Brajmohan
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181434869
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 107
  • Original Price: INR 125.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): Short Stories (single author)

उलझन - रोज़-ब-रोज़ बदल रहे समय और समाज में जो चीज़ आज भी नहीं बदली है वह है स्त्रियों की पराधीनता। सदियों से स्त्रियाँ पुरुष प्रधान व्यवस्था में भेदभाव और शोषण की शिकार हैं। आज पूरी दुनिया में इस महत्वपूर्ण समस्या पर लोगों की निगाहें गयी हैं और ख़ुद स्त्रियों ने भी अपने शोषण-उपेक्षा के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द की है। फिर भी अभी इस दिशा में बहुत कुछ होना शेष है। आज भी अपने देश में स्त्रियों को पुरुषों के समान और स्वतन्त्र हैसियत मिलना शेष है। लेकिन आये दिन दहेज-हत्याओं, बलात्कारों, कन्या भ्रूण-हत्याओं और न जाने कितनी तरह की मार झेलने को विवश स्त्री आज सिर्फ़ इन दुखों को भुगत नहीं रही है, बल्कि वह इनका अपने अनुभव और शक्ति सामर्थ्य से विरोध भी कर रही है। जाहिर है वह भविष्य के रास्ते पर है अग्रसर है।जानी-मानी लेखिका शकुंतला ब्रजमोहन की कहानियों का यह संग्रह स्त्रियों के शोषण का मार्मिक ब्यौरा ही नहीं, उनके संघर्ष का बयान भी है।अन्तिम पृष्ठ आवरणएक दिन हिम्मत करके उसने नीरज से कहा "नीरज! मैं अपने अतीत के बारे में तुमको सब कुछ बताना चाहती हूँ। मैं तुमकों धोखे में नहीं रखना चाहती।"नीरज बोला "अरे यार! गोली मारो अतीत को। मुझे तुम्हारे अतीत से कुछ लेना-देना नहीं है। मैंने तुम्हारा वर्तमान देखा है। वह इतना प्यारा है जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।वीणा ने फिर ज़ोर देकर कहा "नीरज! तुम मेरे अतीत के बारे में कुछ नहीं जानते।" यह कहते-कहते उसकी आँखें छलछला पड़ीं।नीरज ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा "यह अतीत की रट क्यों लगा रही हो। जब मैं सुनना नहीं चाहता तो क्यों ज़िद कर रही हो।" –इसी पुस्तक से

श्रीमती शकुन्तला ब्रजमोहन - श्रीमती शकुन्तला ब्रजमोहन का जन्म वाराणसी नगर के एक सम्भ्रान्त परिवार में 1 जून, 1920 में हुआ। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की। भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय, लखनऊ से उन्होंने संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त की। उनका विवाह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रख्यात गणितज्ञ डॉ. ब्रजमोहन के साथ हुआ था, जो कला संकाय के गणित विभाग के विभागाध्यक्ष थे। हिन्दी भाषा के प्रति उन्हें अगाध प्रेम था, उन्होंने हिन्दी में अनेक पुस्तकें लिखी हैं।सत्तर वर्ष की अवस्था में यदि कोई स्त्री साहित्य-रचना का प्रयास करती है तो इसे उसका दुःसाहस ही कहा जायेगा किन्तु अपने विद्वान पति स्वर्गीय डॉ. ब्रजमोहन जी के प्रोत्साहन के फलस्वरूप उन्होंने कहानी- लेखन का कार्य अपने पति के देहावसान के उपरान्त प्रारम्भ किया और इसी प्रेरणा के फलस्वरूप भारतीय समाज में प्रचलित मूल्यों, मान्यताओं, कुरीतियों, बुराईयों का पर्दाफाश उन्होंने अपनी कृतियों में किया है। विशेष रूप से नारी मन की व्यथाओं, उसकी विवशताओं व समाज में प्रचिलत अन्ध-विश्वास व समानता के लिए समान व्यवहार हेतु नारी-मन की अपेक्षाओं को कहानियों के माध्यम से व्यक्त किया है। वास्तविकता के निकट इनकी कहानियाँ घर-घर की कहानियाँ हैं। यही कारण है कि इनके पात्र हमारे परिचित से लगते हैं।उनकी अन्य उपलब्धियाँ इस प्रकार है।कहानियाँ : तीन दर्जन से भी ज़्यादा कहानियाँ मुक्ता, सरिता, हरिगन्धा, जागृति, पंजाब सौरभ, दैनिक ट्रिब्यून, पंजाब केसरी, राष्ट्रीय सहारा और जनसत्ता में प्रकाशित।अनेक निबन्ध प्रकाशित।उनकी कृतियों से प्रभावित हो कर हरियाणा साहित्य अकादमी ने "उजड़ा अतीत" कहानी (1992-93) तथा "पवित्र झूठ" कहानी संग्रह (1994-95) के लिए पुरस्कृत किया, पंजाब सरकार द्वारा भी 1991-92 एवं 1993-94 में कहानी "अर्न्तद्वन्द्व" तथा निबन्ध “क्या बेटी पराया धन है" के लिए पुरस्कृत किया गया है।हरियाणा साहित्य अकादमी ने महिला सशक्तीकरण वर्ष 2001 के तहत उन्हें महिला सशक्तीकरण पुरस्कार से सम्मानित किया है। उनके कहानी संग्रहों से प्रेरित होकर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की सुश्री सुनीता रानी ने "शकुन्तला ब्रजमोहन की कहानियाँ : कथ्य एवं शिल्प" विषय पर एम.फिल. की उपाधि अर्जित की है।श्रीमती शकुन्तला ब्रजमोहन अपने सामाजिक जीवन में बहुत ही मिलनसार, मृदुभाषी एवं समाज के कमज़ोर वर्ग के लिए दयालु हैं,जिनका प्रभाव उनकी कृतियों में झलकता है।एक लेखिका होने के साथ-साथ श्रीमती शकुन्तला ब्रजमोहन प्रसिद्ध संगीतज्ञ भी हैं।

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