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Uttar-Aadhunik Samay Aur Marxwad

by Sudhish Pachauri
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181439185
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 136
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Revised Edition
  • Item Weight: 350 grams
  • BISAC Subject(s): General

सुधीश पचौरी पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग; पूर्व डीन ऑफ़ कॉलेजेज एवं पूर्व प्रो. व वाइस चांसलर, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। जन्म : 29 दिसम्बर 1948, जनपद अलीगढ़। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) (आगरा विश्वविद्यालय), पीएच. डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार, मीडिया विशेषज्ञ। चर्चित पुस्तकें : नयी कविता का वैचारिक आधार; कविता का अन्त; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन : स्वायत्तता और स्वतन्त्रता (सं.); उत्तर-आधुनिक परिदृश्य; उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; नामवर के विमर्श (सं.); उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्श; दूरदर्शन : विकास से बाज़ार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्श: देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में 'कामायनी'; मीडिया और साहित्य; टीवी टाइम्स; साहित्य का उत्तरकाण्ड; अशोक वाजपेयी पाठ कुपाठ (सं.); प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्य; दूरदर्शन सम्प्रेषण और संस्कृति, स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; मीडिया, जनतन्त्र और आतंकवाद; निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद; विभक्ति और विखण्डन; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया की परख; पॉपुलर कल्चर के विमर्श; भूमण्डलीकरण, बाज़ार और हिन्दी; टेलीविजन समीक्षा : सिद्धान्त और व्यवहार; उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्श; बिन्दास बाबू की डायरी; फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति, रीतिकाल : सेक्सुअलिटी का समारोह; मिस काउ : ए लव स्टोरी; तीसरी परम्परा की खोज। सम्मान : मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में 'कामायनी'); भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानित दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा 'साहित्यकार' सम्मान, ‘शमशेर’ सम्मान एवं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का ‘सुब्रह्मण्यम भारती’ सम्मान।

हालाँकि सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद बहुत-से लोगों ने यह नारा बुलन्द किया था कि 'इतिहास का अन्त हो गया है। या मार्क्सवाद मर चुका है, लेकिन जल्द ही जब सोवियत संघ से अलग हुए अनेक गणतन्त्रों में कम्युनिस्ट पार्टी फिर से चुनाव द्वारा सत्ता में आयी और दूसरी ओर एक-ध्रुवीय दुनिया में अमेरिका ने न्यायाधीश से लेकर जल्लाद तक और दारोग़ा से लेकर जेलर तक की भूमिका निभानी शुरू कर दी तो मार्क्स का प्रेत एक बार फिर समूचे पश्चिमी जगत पर मँडराने लगा। उत्तर-आधुनिक समय की अपनी उलझनें और जटिलताएँ तो थीं ही, इस परिदृश्य में पुराने मार्क्सवादी भी एक बार फिर अपने को टटोलने पर विवश हुए। इस उत्तर-समाजवादी समय में यह द्वन्द्व हर क्षण प्रस्तुत रहता है कि उस मार्क्सवाद का क्या हुआ, उसके 'समाजवाद' का क्या बना जो कल तक पूँजीवाद का एक विकल्प मात्र ही नहीं था, बल्कि वह एक पक्का साबुत सहारा, एक ध्रुव था। वह बिला गया, बिखर गया। समाजवादी व्यवस्था चरमरा गयी। पूँजीवादी व्यवस्था और भी दुर्जेय-सी बन कर सक्षम हुई। है। बची समाजवाद व्यवस्थाएँ भी नये पूँजीवाद से घनिष्ठता बढ़ाने लगी हैं। यत्र-तत्र कम्युनिस्ट पार्टियाँ, उनके नेता जो कल तक विश्व के अन्तर्विरोध को यथातथ्य, मुक़म्मल सक्रिय मानते थे और अपनी समझ को हर बार सही सिद्ध करते थे, उनके पास किसी 'स्ट्रैटेजी' की जगह टैक्टीकल समझ का सहारा ही बचा नज़र आता है। एक पुख़्ता विचार का इस कदर ढीला हो जाना सबके मन में गहरी टीस पैदा करता है जो उससे। प्रेरणा पाते रहे हैं, और आज भी जिनके दिमाग़ की नसों में मार्क्सवाद की क्लासिकल बिजलियाँ कभी-कभी कौंध पैदा कर जाती हैं। यहाँ दी जा रही पाठ-सामग्री इस व्यथा की कथा है। नये को ढूँढ़ने की कोशिश की है और यह जारी है..।

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