Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Uttar Adhunik Media Vimarsh

by Sudhish Pachauri
Save 35% Save 35%
Current price ₹387.00
Original price ₹595.00
Original price ₹595.00
Original price ₹595.00
(-35%)
₹387.00
Current price ₹387.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181434500
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 296
  • Original Price: INR 595.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 500 grams
  • BISAC Subject(s): Media Studies

उत्तर आधुनिक मीडिया विमर्श - आज का मीडिया जगत उत्तर-आधुनिक समय का 'बाई प्रोडक्ट' है, उसके वातावरण में रहता बनता है। उपभोग और अस्मिता के निर्माण के प्रकार्य जहाँ भी हैं, , वे तमाम उत्तर-आधुनिक सांस्कृतिक प्रस्थानों का संकेत हैं। प्रिंट मीडिया, रेडियो, फ़िल्में अभी तक बहुत दूर तक आधुनिक किस्म के 'एक पूर्ण सत्य' (राष्ट्र या परिवार) के निर्माण में लगे नज़र आते हैं, मगर उन्हीं के भीतर बहुत कुछ ऐसा होता है जो उपभोग, अस्मिता, विकेद्रण और चयन की आजादी की बात करता है। आज का मीडिया ख़ासकर अपने यहाँ का मीडिया आधुनिक और उत्तर आधुनिक के इस तनाव में फँसा है और अपने-अपने ढंग से इसका हल करता है। छब्बीस फीसदी एफडीआई के निवेश-युग के बाद मीडिया वह नहीं रहने वाला जो कि अब तक है। वह ग्लोबल वातावरण का अनिवार्य हिस्सा होगा, वह ‘लेट कैपिटलिज्म के सांस्कृतिक तर्क' (फ्रेडरिक जेमेसन) को बढ़ा येगा।पोस्टमॉडर्न और मीडिया के अन्तःसम्बन्धों पर 'पोस्ट मॉडर्निज्म एंड टेलीविज़न' में मार्क ओ'डे ने टेलीविज़न को 'विवादास्पद' उत्तर-आधुनिक माध्यम कहा है। वे कहते हैं : टेलीविज़न विवादास्पद रूप से, सर्वोत्कृष्ट 'उत्तर-आधुनिक माध्यम' है।नकल, स्वांग, प्रपंच, छलना (साइमूलेशंस), अति चंचला - यथार्थ (हाइपर रीयलिटी), खंड-खंडता (फ्रेगमेंटेशन), विजातीयता, बहुविधिता, विकेंद्रण, अन्तर्पाठीयता (इंटर टेक्स्चुअलिटी), अति पाठीयता, उप-पाठ (सब-टेक्स्ट), अति-पाठ (हाइपर-टेक्स्ट), शब्द क्रीड़ा, पैरोडी, पेश्टीच आदि अनेक उत्तर-आधुनिक विमर्शात्मक पद, टीवी के 'पाठ' में लगभग 'रेडीमेड' तरह से काम में आते हैं। —इसी पुस्तक सेअन्तिम पृष्ठ आवरणमीडिया वालों को कुछ देर टाइम निकालकर सोचना विचारना चाहिए कि हाइप और यथार्थ में किस तरह भेद करें। पूरे मुल्क की तकदीर का फैसला जब तीन घंटे में हो रहा हो तो राजनीतिक टिप्पणी भी तीन सेकेंड की होंगी। सब कुछ लाइव होकर भी यदि डैड हो रहा हो तो लाइव प्रसारण की नीति पर भी विचार किया जाना चाहिए। चमचागिरी करना, फिर ज़ख़्म कुरेदना मीडियाकर्मियों का काम नहीं।एक ज़माना था जब मीडिया का नारा था 'आज़ादी' । गुलामी से आज़ादी। अब भी यही नारा है लेकिन सन्दर्भ बदल गया है। अब इसका मतलब है : संकीर्णता और रूढ़िवाद से आज़ादी! और यह आज़ादी मीडिया की उस मध्यवर्ती भूमिका के बिना सम्भव नहीं जिस मुक्त बाज़ार, उपभोक्तावाद और ग्लोबल तकनीक सम्भव करते हैं।इसलिए मीडिया पाठ्यक्रमों में 'आपदा प्रबन्धन पाठ्यक्रमों' का हिस्सा होना चाहिए। जो आपदा की सूचना के निर्माण, भाषा में, चित्रों में उसके निर्माण को प्रबन्धन के साथ तालमेल में करे। यथार्थ चित्रण को नहीं छोड़े लेकिन अपने संचार के परिणामों से अति सावधान होकर चले। इसके लिए मीडिया गृहों को अलग 'ओरिएंटेशन कार्यक्रम' चलाने चाहिए।—इसी पुस्तक से

सुधीश पचौरी - जन्म : 29 दिसम्बर, 1948 जनपद अलीगढ़।शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी) (आगरा विश्वविद्यालय)पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।चर्चित पुस्तकें– नई कविता का वैचारिक आधार–कविता का अन्त।–दूरदर्शन की भूमिका–दूरदर्शन : स्वायत्तता और स्वतंत्रता (सं.)–उत्तर-आधुनिक परिदृश्य–उत्तर आधुनिकता और उत्तर संरचनावाद–नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति–नामवर के विमर्श (सं.)–उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्श–दूरदर्शन : विकास से बाज़ार तक–उत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्श–देरिदा का विखंडन और विखंडन में'कामायनी'–मीडिया और साहित्य–टीवी टाइम्स–साहित्य का उत्तरकांड–अशोक वाजपेयी पाठ कुपाठ (सं.)–मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तंभकार,मीडिया विशेषज्ञ।–मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् का रामचंद्रशुक्लसम्मान (देरिदा का विखंडन और विखंडन में 'कामायनी')–भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित| दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा 'साहित्यकार का सम्मान–प्रसार भारती और प्रसारण परिदृश्य– दूरदर्शन: संप्रेषण और संस्कृति–स्त्री देह के विमर्श–आलोचना से आगे–मीडिया, जनतंत्र और आतंकवाद– निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद–विभक्ति और विखंडन– हिंदुत्व और उत्तर आधुनिकता–मीडिया की परख–पॉपूलर कल्चर–भूमंडलीकरण, बाज़ार और हिन्दी–टेलीविजन समीक्षा : सिद्धान्त और व्यवहार- उत्तर आधुनिक मीडिया विमर्श– विदास बाबू की डायरी–फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us