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Vanpakhi Utare Pahad Se

by Yashodhara Rathaur
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789357753272
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 194
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 350 grams
  • BISAC Subject(s): General

वनपाखी उतरे पहाड़ से - बनावट और बुनावट के धरातल पर यशोधरा राठौर के गीत अपने समकालीन नवगीतकारों से इस अर्थ में भिन्न हैं कि वे अपने गीतों में प्रयोगधर्मी नयापन लाने के लिए गीत के छन्दों के साथ अमानवीय खिलवाड़ नहीं करतीं और न ही उनके गीतों के विभिन्न बन्द अर्थ-संहति की दृष्टि से अलग-अलग अर्थ देते हैं, उनमें एक तारतम्यता होती है। उनके गीतों के आन्तरिक संघटन में उनकी लय-संरचना की तरह ही अर्थान्विति होती है, जिससे उनके गीतों में समग्रता का बोध होता है । उनके गीतों की भाषा बिल्कुल सहज, आम बोलचाल के करीब है, किन्तु अकलात्मक कतई नहीं है। यशोधरा जी के गीतों में अर्थ-अमूर्तन की सरहद में प्रवेश कर जाने वाले संश्लिष्ट बिम्ब नहीं के बराबर हैं। वे अपने काव्य-बिम्ब की रचना के लिए भाववादी कल्पना-लोक में नहीं भटकतीं, अपितु अपने आस-पास बिखरी दुनिया और सामाजिक जीवन से उन्हें चुनती हैं, जिसके कारण उनके गीत पाठकों की संवेदना से सीधे-सीधे जुड़ जाते हैं और उसमें एक आत्मीय अपनापन का अहसास होता है। सामाजिक यथार्थ के विभिन्न रूपों को वे अपने गीतों में समेट लेने में काफ़ी कुशल दिखाई देती हैं- "आदमी अब / आदमी जैसे नहीं मिलते/नहीं मिलती/ धूप में अब गुनगुनाहट है/ऊब, टूटन, घुटन है/औ, कसमसाहट है/हैं न झांका से हवा के पात अब हिलते।"-नचिकेता܀܀܀܀܀܀नवगीत की संवेदनशीलता सहज ग्राह्य तो होती ही है, प्रतिरोध और प्रतिकार का वातावरण भी निर्मित करती है और आम आदमी के मन में क्रान्ति की अवधारणा का बीजारोपण करती है । इस सन्दर्भ में यदि डॉ. यशोधरा राठौर के गीत-नवगीत अर्धशती-पूर्व के लोकगीतों से लेकर आज तक के नवगीतों के विकास-क्रम को सम्पूर्णता से स्वयं में समेटे हुए हैं जो अगले सोपानों पर निरन्तर क़दम रखते हुए कोमलता से खुरदुरेपन की ओर अग्रसर हैं जिससे उनके भविष्य के महान नवगीतकार होने का परिचय मिल जाता है। डॉ. राठौर के सृजन में गेयता एवं नवता दोनों के रागात्मक प्रसंगों के साथ नूतन संवेदना की सृष्टि होती दिखाई पड़ती है, जिसके अर्थवान बिम्बों में मर्मस्पर्शी चेतना वर्तमान है। नवगीत : 'नयी दस्तकें', 'धार पर हम', नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्य-बोध, 'शब्दायन : दृष्टिकोण एवं प्रतिनिधि’, ‘गीत-वसुधा', 'नयी सदी के नवगीत', 'समकालीन गीतकोश', 'नवगीत के नये प्रतिमान' आदि संकलनों में उनकी उपस्थिति गीत - नवगीत के उज्ज्वल भविष्य हेतु आश्वस्त करती है।- मधुकर अष्ठाना

यशोधरा राठौर -जन्म : 27 जुलाई 1963, ढोली, मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., बी.एड., एल.एल.बी.।मौलिक कृतियाँ : आंग्ल काव्य-संग्रह : द मोस्ट ऑफ़ लाइफ़ (2005); काव्य-संग्रह : पृथ्वी कहते हैं लोग उसे (2006); नवगीत संग्रह : उस गली के मोड़ पर (2008); भरेंगे परवाज़ के परवान अक्षर (2011), जैसे धूप हँसती है (2009); कहानी-संग्रह : शेरवानी; अंग्रेज़ी कविता-संग्रह : द साउंड ऑफ़ साइलेंस; स्वातन्त्र्योत्तर गीतों का प्रामाणिक संचयन : गीत-वसुधा (2012); आलोचना : किशोर : संवेदना एवं अनुभूति (2008), समकालीन आलोचना दृष्टि (2021)। सम्पादन : श्रम सौन्दर्य का साधक (2009), गुरु व्याकरण तरंग, भाग-6 (2014), गुरु व्याकरण तरंग, भाग-7 (2015)।सम्मान : 'राष्ट्र गौरव सम्मान', बिहार के राज्यपाल द्वारा (2003), 'कला-नेत्री सम्मान', बिहार (2004), 'साहित्य सेवी सम्मान', पटना (2006), 'स्वास्थ्योत्सव सम्मान', पटना (2007), 'समाजसेवी सम्मान', कोलकाता (2008), 'भारतेन्दु सम्मान', मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार (2008), 'ज्ञान-गरिमा सम्मान', मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार (2008), 'अलख सम्मान', चित्तौड़गढ़, राजस्थान (2009), 'आदर्श शिक्षक सम्मान', पटना (2009), 'गीत रत्न सम्मान', पटना (2011), 'शब्द-शिल्पी सम्मान', भोपाल (2012), 'झारखण्ड-सेवा रत्न', राँची (2013), 'साहित्य मेधा सम्मान', राँची (2014), 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', इलाहाबाद (2016), 'झारखण्ड रत्न', राँची (2017), 'नवगीत गौरव सम्मान', रायबरेली, उत्तर प्रदेश (2018)।अन्यान्य सहभागिता : विश्व हिन्दी सम्मेलनों (अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस एवं भोपाल) सहित अनेक साहित्यिक राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता ।कला : कुल 200 से अधिक तैल चित्रों का निर्माण एवं एकल एवं सामूहिक राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में सहभागिता ।पूर्व सदस्य: पूर्वी क्षेत्र, सांस्कृतिक केन्द्र कोलकाता, कला संस्कृति विभाग, बिहार/झारखण्ड । सम्प्रति : विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग एवं निदेशक, परफॉर्मिंग आर्ट विभाग डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, राँची (झारखण्ड)।

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