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Vishwabahu Parashuram

by Dr. Vishwambhar Nath Upadhyaya
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170555148
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 448
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 700 grams
  • BISAC Subject(s): General

आर्यों के पौराणिक काल विभाजन में हासवादी दृष्टि है, सत्युग में धर्म की पूर्ण विद्यमानता, पुनः त्रेता में ह्रास, द्वापर में उससे अधिक पतन और कलियुग में महापतन। पुराणकारों का ध्यान मेरी दृष्टि से इस बात पर रहा है कि 'सत्युग' में ऋषि-मुनि या धर्मज्ञों की चलती थी, महत्त्व मनुष्य की मेधा, सृजन, ज्ञान-विज्ञान और लोकोत्तर अन्तर्दृष्टियों का था, बाद के युग में त्रेता और द्वापर में महत्त्व शासकवर्ग का बढ़ गया और कलियुग में यन्त्र तथा धन का, पूँजी का। इस काल विभाजन में द्रष्टव्य यह है कि पौराणिकों ने युग-विभाजन में, मानव धर्म या मूल्यों को आधार बनाया है और जहाँ तक एक यूथ या क़बीले में मानवीयता यानी समता, बन्धुत्व और स्वतन्त्रता का प्रश्न है, वह प्रारम्भिक समाजों या आदिमकालीन क़बीलों में निश्चय ही था किन्तु परम्परावादी, सत्युग के आदर्शीकरण की अति में यह भूल जाते हैं कि क़बीलों में आपस में ही समता थी, सभी के साथ नहीं। क़बीलों की टकराहटें सत्युग का कठोर तथ्य था और उसमें क्रूरता अपरिहार्य थी। सत्युग में आर्यों में भी आपसी युद्ध भी हुए जैसे दशराजयुद्ध और वे मिलकर भी दुष्ट शासकों से लड़े, आर्य-अनार्य संघर्ष भी हुए, होते रहे और राम जैसे ऋषियों के प्रयत्नों से आर्य-अनार्यगण मिलकर भी सामान्य शत्रुओं से भिड़े, यह भी इतिहास का तथ्य है पर पौराणिक इस प्रकार सत्युग का वर्णन करते हैं जैसे उस युग में धर्म या मानवता पूर्णतः स्थापित थी और आनन्द, सद्भाव और समता आदि से चैन की वंशी बजती रहती थी।अतएव एक विशिष्ट ऐतिहासिक काल में रचित वैदिक कविता तथा परवर्ती पुराणादि में जो मानवसत्य या मूल्य मिलते हैं, उनका सामान्यीकरण कर आधुनिक युग में उन्हें सार्वभौमिकता दी जा सकती है। इस उपन्यास में यह भी प्रयत्न किया गया है।गंगा का प्रवाह भगवान परशुराम का गत्यात्मक मानस है जो सोचता हुआ बह रहा है और जिसकी कोई थाह नहीं है... किनारे से छप्-छप् करतीं लघु वीचियाँ तट से बतियाती भी हैं और उसकी जड़ता पर उसे तमचियाती भी हैं... वृक्ष इस कौतुक पर प्रसन्न होकर वायु के झकोरों में रत्नों की भाँति पत्तियाँ, फल, फूल, गिरा रहे हैं, और 'साधु ' ' साधु' कह रहे हैं... वातावरण में ब्रह्मा कविता घोल रहा है... और ऐसा अर्थ भर रहा है जिसे मन अनुभव तो करता है कि कुछ है पर क्या है, यह बोध में आता नहीं है ... एक अस्फुटता है सृष्टि में... सविता किरणों की अँगुलियों से उस तात्पर्य को टटोलता है और न मिलने पर ताप बढ़ाकर उस प्रयोजन को पिघलाने में लगा है...यह सब जो हो रहा है, होता रहता है, वह, प्रातः-सन्ध्या, रात-दिन, निरन्तर होता रहता है, वह गंगा की बालू पर चलती वायु के खेल की भाँति है जो रेत पर लकीरें खींचता है, एक ज्यॉमिति बनती है और विद्यालय के बालक की स्लेट पर लिखे व्याकरण-सी मिट जाती है, और पुनः हवा बालुका पर बारहखड़ी लिखने लगती है।

डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्यायजन्म : 7 जनवरी, 1925शिक्षा : एम.ए. हिन्दी, 1953, एम.ए. संस्कृत, 1955, पीएच.डी. - हिन्दी 'सन्त वैष्णव काव्य पर तान्त्रिक प्रभाव', 1959, डी.लिट्. ‘भारतीय काव्यशास्त्र' 1970, आलाक़ाब्लियत, उर्दू, साहित्य रत्न —प्रथम श्रेणी। अध्यापन अनुभव :प्रवक्ता : हिन्दी विभाग, 1953 से 1960 तक आगरा कॉलेज, आगरा।प्रवक्ता : डी. एस.बी., राजकीय महाविद्यालय, नैनीताल, 1960 से 1965 तक।रीडर : हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर, 1965 से 1980 तक। प्रोफेसर तथा अध्यक्ष : हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर-1980-85। मानद निदेशक : प्रेमचन्द एवं सुब्रह्मण्य भारती पीठ, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर। प्राचार्य, विश्वविद्यालय संघटक महाविद्यालय, राजस्थान कॉलेज, जयपुर, 1978-80। कुलपति, कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर, 1991-94।वाणी से प्रकाशित पुस्तकें :आलोचना : भारतीय काव्यशास्त्र, परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए।उपन्यास : रीछ, विश्वबाहु परशुराम, सिद्ध सरहपा, विद्याधर बैताल आख्यान। कविता : गंगा, गुनगुनाते हुए।पुरस्कृत रचनाएँ :विश्वबाहु परशुराम-बिड़ला फाउंडेशन तथा महाराष्ट्र राज्य अकादमी, मुम्बई भारत-भारती सम्मान, हिन्दी संस्थान, उत्तर प्रदेश।

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