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Vishwakavya Aur Jaishankar Prasad

by Premshankar
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789388434607
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 86
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

पाश्चात्य काव्य की बिखरी हुई दीर्घ परम्परा में समाज और समय की गति के साथ काव्य की धारा प्रवाहित होती रही। विश्वकाव्य में पूर्व-पश्चिम के कवियों का प्रमुख योग है और उन्होंने काव्य की परम्परा को प्रभावित किया। होमर, दान्ते, मिल्टन, शेक्सपियर, बायरन, गेटे, पुश्किन का व्यक्तित्व आज भी अद्वितीय है। विश्वकाव्य से प्रकट है कि महान रचनाकारों में एक निकटता स्थापित की जा सकती है। संसार को अपनी अन्तर्भेदिनी दृष्टि से देखने वाले साहित्यकार जीवन के व्यापक क्षेत्र में कार्य करते हैं। अपने महान व्यक्तित्व से वे समग्र साहित्य को प्रभावित करते हैं। आनेवाली पीढ़ियाँ और युग उनकी रचनाओं से जीवन पाते हैं। कला की दृष्टि से वे अभिव्यंजना के सहज माध्यम को स्वीकार करते हैं, जिसमें भावों का अधिकाधिक प्रकाशन होता रहे। चेस्टरटन का कथन है कि कोई कारण नहीं है कि दो स्वतन्त्र कवि एक ही कल्पना और विचार के विषय में स्वतन्त्र रीति से न सोचें। इस दृष्टि से प्रसाद विश्व के महान कवियों के समीप होते हुए भी किसी बँधी हुई परम्परा का अनुकरण नहीं करते। वास्तव में महान कृतिकारों को किसी सीमा अथवा वाद के बन्धनों में नहीं बाँधा जा सकता । समग्र मानवता और जीवन उनकी परिधि में आ जाते हैं।

प्रेमशंकर -जन्म : सन् 1930 ई. में नैमिष क्षेत्र के एक निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण परिवार में। आरम्भिक शिक्षा डॉ. जयदेव सिंह की कृपा से । परवर्ती अध्ययन काशी विश्वविद्यालय में। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के निर्देशन में 'प्रसाद का काव्य' विषय पर शोधकार्य ।लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज और सागर विश्वविद्यालय में अध्यापन । इतिहास, समाजशास्त्र एवं संस्कृति में विशेष रुचि ।लखनऊ से प्रकाशित पत्रिका 'युग चेतना' के सम्पादक मंडल में। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनात्मक हिस्सेदारी । योरोप के कुछ विश्वविद्यालयों में व्याख्यान । इटली में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में अध्यापन ।प्रकाशित पुस्तकें : प्रसाद का काव्य, कामायनी कारचना-संसार, हिन्दी स्वच्छन्दतावादी काव्य, भक्तिचिन्तन की भूमिका, भक्तिकाव्य की भूमिका, कृष्णकाव्य और सूर, रामकाव्य और तुलसी, भक्तिकाव्य की सांस्कृतिक चेतना, भक्तिकाव्य का समाजदर्शन, सृजन और समीक्षा, आ. नन्ददुलारे वाजपेयी, नयी कविता की भूमिका, सियारामशरण गुप्त (आलोचना); पहाड़ी पर बच्चा (कविता)।

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