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Yah Aakanksha Samay Nahin

by Gagan Gill
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789360867539
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 136
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 180 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

कोई भी कविता अपने समय से गुज़रकर ही सार्थकता अर्जित करती है, यह बात गगन गिल की कविता भी प्रमाणित तो करती है, लेकिन इस तरह नहीं कि समय उनके यहाँ कविता का कोई घोषित विषय हो। ये कविताएँ निस्सन्देह नितान्त निजी अनुभूतियों की कविताएँ हैं। लेकिन यदि कवयित्री इन नितान्त निजी अनुभूतियों और अपने स्वर-वैशिष्ट्य को अक्षत रखते हुए भी युग-संवेदन को व्यंजित कर पाती है, तो इसकी वजह यही है कि समय उसकी काव्योक्तियों में नहीं बल्कि उसके स्थापत्य में, उसकी लय-संरचना में विन्यस्त होता है। यही कारण है कि गगन गिल की कविता को एक दृश्य की तरह देखें तो वह एक शान्त, निरावेग झील का आभास देती है, लेकिन उसे स्पर्श करें तो समय के सभी तनावों-दबावों की थरथराहट महसूस होती है। अक्सर यह कविता शब्दों में नहीं, उनके बीच के अन्तराल में सम्भव होती है। गगन गिल की कविता में शब्द और शब्द के बीच जिस तनाव का अनुभव होता है, उसे सिर्फ़ संगीत की तरह महसूस किया जा सकता है, उसका वक्तव्य नहीं हो सकता।

इसलिए इस बात का महत्त्व एक हद तक ही है कि ये कविताएँ प्रेम के बारे में हैं, वैराग्य के बारे में अथवा स्त्री की स्थिति आदि के बारे में। 'जल के भीतर सूख रहे जल', 'गूँगे के कंठ में याद आया गीत' अथवा 'पिछले जन्म में अधबनी रह गयी थी रोटी तुम्हारे नाम की' ऐसी निजी अनुभूतियों को व्यंजित करते शब्दों के बीच के अन्तराल को विन्यस्त करती एक सम्पीडक-कॉम्प्रेस्ड- लय न केवल समय की जटिलता और विकलता की ध्वन्याकृति हो जाती है, बल्कि इसी कारण अपनी ही एक भाषा की तलाश भी। इसलिए इन काव्यानुभूतियों से गुज़रते हुए रॉबर्तो हुआरोज़ की इस उक्ति का स्मरण आना अस्वाभाविक नहीं है कि कविता भाषा के तल में अस्तित्व का विस्फोट है।

—नन्दकिशोर आचार्य

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