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Yaron Ke Yar Dushyant Kumar

by Ed. by Vijay Bahadur Singh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789362877505
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 216
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): Memoirs

हुआ कुछ यूँ कि दुष्यन्त कुछ देर से कॉलेज में आया। अतः क्लास में नयी शक्ल का परिचय 'शील' जी ने माँगा। देखा पीछे एक गोरा चिट्टा, छरहरा, ख़ूबसूरत, कुर्ता-पजामा और टोपी में खड़ा हुआ लड़का अध्यापक से मुखातिब हो रहा है—“मैं ज़िला बिजनौर के उस क्षेत्र का निवासी हूँ जहाँ कण्व के आश्रम में दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रणय लीला हुई थी और इत्तफ़ाक से मेरा नाम भी दुष्यन्त ही है।" वाक्य के समाप्त होते-होते उसकी दृष्टि अध्यापक से हटकर छात्रों की ओर पहुँच चुकी थी और इससे पहले कि अध्यापक महोदय कुछ बोल पायें, उसकी अदा में बाँकपन आया, दृष्टि छात्राओं पर जमी और अगला वाक्य चल पड़ा—“परदेसी उपनाम से कविता लिखता आपके लिए अब तक हूँ भी परदेसी ही, किन्तु आगे परदेसी नहीं रहूँगा, 'प्रियतम' बन जाने का इरादा है।" सुनते हुए लड़कियों की आँखें मेज़ों पर घूर कर मुस्कराने लगीं, लड़कों के ठहाकों से कमरा गूँज उठा और शील जी के मुख से 'अच्छा-अच्छा' के साथ अध्यापन शुरू हो गया। आगे चल कर तो शील जी ने हम दोनों को 'विद्वान' की उपाधि प्रदान करने के साथ-साथ, उपस्थितियों के झंझट से आश्वस्त करके क्लास से पूरी तरह छुट्टा रहने का आग्रहपूर्ण आदेश दे दिया था, जिसे हम लोगों ने गुरु के अनुग्रह में सहर्ष शिरोधार्य कर उन्हें अपनी अनुपस्थिति की गुरु दक्षिणा देकर स्थायी प्रसन्नता का अधिकारी बना दिया था।—इसी पुस्तक से

विजय बहादुर सिंहजन्म : 16 फ़रवरी 1940, संवत् 1997 मास फाल्गुन, गुरुवार को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद (अब अम्बेडकर नगर) में एक ज़मीदार परिवार में जन्म। 27 सालों तक पुरा नगरी विदिशा के स्नातकोत्तर जैन महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के बाद 1995 से 2003 तक भोपाल के उच्च-शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान में हिन्दी के विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त। 2008 से 2010 तक कलकत्ता के भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और मासिक पत्रिका 'वागर्थ' के सम्पादक। अनेक विश्वविद्यालयों में अतिथि आचार्य। लेखन की शुरुआत आलोचना से, बाद में कविता, संस्मरण, जीवनी लेखन, शिक्षा और समाज की समस्याओं से सम्बन्धित लेखन भी।आलोचना पुस्तकें : ‘छायावाद के कवि : प्रसाद, निराला और पन्त’, ‘नागार्जुन का रचना-संसार’, ‘कविता और संवेदना’, ‘उपन्यास समय और संवेदना’, ‘मुक्तिसंघर्ष और साहित्यकार की भूमिका’, ‘कविता की स्वदेशी तेजस्विता और भवानी प्रसाद मिश्र, लोकप्रिय कविता की कसौटियाँ’, ‘महादेवी के काव्य का नेपथ्य’, ‘विजय बहादुर सिंह : आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, जीवनी कवि-संवाद एवं संस्मरणात्मक आलोचना’, ‘नागार्जुन-संवाद, आलोचक का स्वदेश’, ‘दुष्यन्त कुमार’ (मोनोग्राफ) साहित्य अकादमी से। ‘अनभिजात का सौन्दर्य’, ‘अँधेरे में मशाल : नागार्जुन रचना संचयन’, ‘वह मणियारा साँप’, ‘पाश्चात्य काव्य शास्त्र’, ‘जातीय अस्मिता के प्रश्न और जयशंकर प्रसाद’, ‘समकालीनों से संवाद’ (साक्षात्कार एवं संस्मरण), ‘आलोचना का प्रतिपक्ष’, ‘सत्ता-समाज’ और ‘देश, मध्यकाल के मेरे प्रिय कवि’ ।कविताएँ : ‘मौसम की चिट्ठी’, ‘पृथ्वी का प्रेमगीत’, ‘पतझर की बाँसुरी’, ‘शब्द जिन्हें भूल गयी भाषा’, ‘भीम बैठका’ (स्वतन्त्र लम्बी कविता), ‘भीम बैठका तथा अन्य कविताएँ’ (लम्बी कविताओं का संग्रह), ‘तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो-स्वतन्त्र लम्बी कविता’, ‘आप के लाये हुए दिन’ (गीतात्मक एवं ग़ज़ल), ‘अर्ध सत्य का संगीत’, ‘फूल को याद थे सारे मौसम’।सम्पादन : ‘अंग्रेजों से पहले का भारत और भारतीय चित्त मानस और काल’, ‘समकालीनों की नज़र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, संस्कृति-संवाद’, ‘भवानीप्रसाद मिश्र रचनावली’, ‘दुष्यन्त कुमार रचनावली’, ‘नंददुलारे वाजपेयी रचनावली’, ‘भवानी प्रसाद मिश्र : संस्मरण और आलोचना’, ‘वसन्त पोतदार : एक असाधारण गद्य शिल्पी’।

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